बैंकर एवं ग्राहक के बीच में रिश्ता
१) जब एक ग्राहक बैंक में खाता खोलता हैं तो उन दोनों के बीच एक एग्र्रीमेंट (लिखित समझौता) होता है जो मूलतः डेब्टर एवं क्रेडिटर का होता है जो उसी प्रकार का है जैसे ऋण देने वाले एवं लेने वाले का होता है.
यदि यह खाता जमा वाला है तो जमा करने वाला ग्राहक क्रेडिटर है एवं बैंक डेब्टर है. यदि ये ऋण खाता है तो उसका ठीक उल्टा रिश्ता है।
२) बैंक में इसके अलावे भी कई तरह के रिश्ते होते हैं जैसे
बिल डिस्कॉटिंग / परचेज के केस में बैंक डेब्टरऔर ग्राहक क्रेडिटर है।
ड्राफ्ट बनबाने में बैंक होल्डर फॉर वैल्यू है और ग्राहक क्रेडिटर है।
लाकर देने पर बैंक लैसर है और ग्राहक लेस्सी है।
यदि कोई व्यक्ति कोई डॉक्यूमेंट फीस देकर बैंक की कस्टडी में रखने देता है तो बैंक ग्राहक का कस्टोडियन होता है ।
इन रिश्तों में सबके अपने अपने अधिकार एवं कर्तव्य/ जिम्मेदारियाँ हैं।
रिश्ते की समाप्ति
यदि ग्राहक की मृत्यु हो जाये या ग्राहक बैंक का में अपना खाता बंद कर दे तो अथवा बैंक अपनी तरफ से खाता बंद कर दे या बैंक लिक्विडेट (बंद) हो जाये तो बैंकर एवं ग्राहक का रिश्ता ख़तम हो जाता है
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