सोमवार, मार्च 07, 2022

वित्तीय समावेशन


 

वित्तीय समावेशन

 

भारतवर्ष में बैंक की शाखाएं ज्यादातर शहरी इलाकों में और कुछ हद तक अर्ध शहरी इलाकों तथा थोड़े बहुत ग्रामीण इलाकों में है। अभी भी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में बहुत सारे ऐसे इलाके हैं जहां तक बैंकों की पहुंच नहीं है। 

किसी क्षेत्र का सर्वांगीण विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक बैंक खाता खोलने हेतु बैंक की शाखा, बीमा की सुविधा, बैंकिंग से संबंधित अन्य सुविधाएं, जैसे किसी बैंक के एक खाते से दूसरे बैंक के अन्य खाते में पैसा भेजना यानी रेमिटेंस, ऋण की सुलभता और वित्तीय सलाह से संबंधित सुविधा नहीं हो।

 

वित्तीय समावेशन क्या है

 

ऐसे क्षेत्र को जहां के लोग वित्तीय सुविधाओं से वंचित हैं, उसे फाइनेंसियल एक्सक्लूडेड यानी वित्तीय सुविधा रहित क्षेत्र कहा जाता है। इन वित्तीय सुबिधा रहित क्षेत्र में वहन करने योग्य खर्च पर वित्तीय सुविधा प्रदान कर सभी लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना वितीय समावेशन है।

इस तरह का क्षेत्र सामाजिक उत्थान में पिछड़ा रह जाता है, जो वांछनीय नहीं है। इसका दुष्प्रभाव समाज और देश के विकास पर पड़ सकता है। 

इसलिए सर्व प्रथम भारत सरकार ने 2004 में रंगराजन कमिटी बनाई। जिसे फाइनेंसियल इंक्लूजन पर अपना रिपोर्ट देने को कहा। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर मंगलम नाम के एक गांव को चुना गया जिसमें सबसे पहले फाइनेंसियल इंक्लूजन का काम किया गया। इसमें शत प्रतिशत घरों को बैंकिंग सुविधा देने के लिए, सबके बैंक खाते खुलवाए गए। यह खाते या तो बचत खाते थे या ऋण के खाते थे। इस गांव को सबसे पहले फाइनेंशियल इंक्लूजन होने का गौरव प्राप्त हुआ। 

इस प्रकार फाइनेंसियल इंक्लूजन का मतलब हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति को जो बैंक से जुड़ा नहीं है, उनको या तो ऋण देकर या बचत खाता खुलवा कर बैंकिंग सुविधा से जोड़ना। इसके लिये ये जरुरी नहीं है कि वहाँ बैंक की शाखा खोल कर ही कार्य पूरा हो। 

सन 2005-2006 में भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को नो फ्रिल अकाउंट खोलने के लिए आदेश दिया। इसके बाद बैंकों ने गरीब और बंचित लोगों के खातों को शून्य राशि पर खोलना शुरू किया।

हलांकि इससे इस कार्य में तेजी तो आई, पर शून्य राशि पर खोले जाने के आदेश के बाबजूद ज्यादा प्रगति नहीं हुई। क्योकि ऐसे गरीब लोग के पास केवाईसी से संबंधित सभी कागज भी नहीं थे। इसलिए इनको इसमें भी कुछ छूट दी गई और शून्य राशि के कारण खातों पर बैंकों में लगने वाले प्रभार को भी माफ कर दिया गया। लेकिन फिर भी ये पूरा न हो सका। 

इसका मुख्य कारण यह था कि बैंक की शाखाएं मुख्य रूप से शहरी और अर्ध शहरी क्षेत्र में ही थे। ग्रामीण क्षेत्र में बहुत ही कम थे। सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में जाकर वहां के गरीब, सीमांत कृषक, लघु कृषक, भूमिहीन श्रमिक, बटाईदार, महिलाएं, असंगठित क्षेत्र में कामगार आदि का खाता खोलना एक बहुत ही मुश्किल का चुनौती भरा कार्य था। क्योंकि इसमें खर्चे बहुत आ रहे थे, और बैंक की लाभप्रदता पर बुरा असर हो रहा था। इसलिए एक नई अवधारणा दी गई कि यह किस तरह से कम खर्चे में किया जा सकता है। 

इस के आधार पर निम्नलिखित कदम उठाए गए। 

  1. बी सी यानी बिजनेस करस्पॉडेंट और बी एफ यानी बिजनेस फैसिलिटेटर, की अवधारणा। 

इसको हिंदी में कारोबार प्रतिनिधि करोबार सुलभ कर्ता कहते हैं। उस के माध्यम से फाइनेंसियल इंक्लूजन के कार्य में तेजी लाई गई। 

2.            इसके अलावा सूक्ष्म वित्त सस्थाऔँ द्वारा भी ग्रामीण क्षेत्र में सूक्ष्म वित्त देकर फाइनेंसियल इंक्लूजन में तेजी लाने का लक्ष्य रखा गया।

3.            इस कार्य में और तेजी लाने के लिए बैंकों को एस एच जी यानी स्वयं सहायता समूह एवं ज्वाइंट लायबिलिटी ग्रुप जे एल जी यानी संयुक्त देयता समूह के माध्यम से वित्तीय वंचित क्षेत्र में ऋण वितरण करने कहा गया। 

4.            मनरेगा एवं अन्य सरकारी कार्यक्रम में दिए जाने वाले वित्तीय सहायता को सीधे बैंक द्वारा देने से भी फाइनेंसियल इंक्लूजन में बहुत सहायता मिली है। ऐसा करने से जिस व्यक्ति का खाता नहीं था, उन्हें भी इसका लाभ उठाने के लिए बैंक में खाता खोलने पड़े। इस प्रकार फाइनेंसियल इंक्लूजन का लक्ष्य भी पूरा हुआ।

5.            सरकार ने वित्तीय सलाह देने के लिये हर जिले में फाइनेंशिअल लिटरेसी ऐण्ड क्रेडिट कौन्सेलर (वित्तीय साक्षरता एवं ऋण परामर्श दाता) नियुक्त किये हैं।

6.            2015 में इस कार्य मे तब तेजी आई जब प्रधानमंत्री के आदेशानुसार सारे बैंकों में जनधन खाता खोलने शुरू किए।

इस प्रकार वित्तीय समावेशन का कार्यक्रम बहुत हद तक सफल हो गया है।

 

वित्तीय समावेशन की परिभाषा

 

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए यदि यह पूछा जाए की फाइनेंसियल इंक्लूजन की परिभाषा क्या है तो कोई भी यह कह सकता है कि " फाइनेंसियल इंक्लूजन का मतलब ऐसी सुविधा से है, 

> जिससे ऐसे गरीब जो वित्तीय सुविधा से बंचित लोग थे, जिनका कोई खाता बैंक में नहीं था, उनका खाता खुलवाना। 

>चाहे यह खाता बचत खाता हो या यदि उन्हें यदि ऋण  की जरूरत है, तो ऋण खाता हो। 

> कृषि ऋण के लिए तथा लघु उद्यमी के लिए किसान क्रेडिट कार्ड और लघु उद्यमी क्रेडिट कार्ड उपलब्ध करना।

>उन्हें बैंक में या अन्य बीमा की कंपनी से बीमा की सुविधा देना।

>यदि वह अपना अपना धन एक जगह से दूसरी जगह भेजना चाहते हैं तो धन प्रेषण की सुविधा देना। 

>यदि उन्हें कोई वित्तीय सलाह चाहिए जो वित्तीय सलाह देना। 

>यह सब कम खर्चे पर यानि वहन करने योग्य खर्च पर करना।

 

वित्तीय समावेशन की जरूरत

 

भारत को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा हो गए हैं। सही ढंग से आकलन किया जाए, तो अभी भी काफी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रह रही है।  गरीबी का कारण मुख्य रूप से समावेशी वित्तीय सुविधा तथा समावेशी बैंकिंग बैंकिंग की कमी है। समावेशी वित्तीय सुविधा का मतलब सभी व्यक्तियों को एक समान अवसर नहीं मिला। अपने देश में जो भी वित्तीय संसाधन है, जो अवसर हैं, उसमें सबको बराबर बराबर मौका मिलना चाहिए। चाहे वह सबसे निम्न पायदान पर खड़े हमारे समाज के सदस्य हैं।

 

अब जब सरकार यह कह रही है कि वित्तीय समावेशन का लक्ष्य करीब-करीब पूरा हो गया है, तो इस बात को सुनिश्चित करना पड़ेगा कि सभी लोगों को बराबर बराबर रूप से बैंकिंग का फायदा मिल रहा है या नहीं। 

वित्तीय समावेशन से गरीब पिछड़ों की भी जागरूकता बढ़ी है। खासकर ऐसे गरीब लोगों को जो पूंजी के अभाव में बेरोजगार थे, उन्हें रोजगार का अवसर मिला है। इससे बहुत हद तक गरीबी दूर हुई है। इसका साक्षात प्रमाण किसी भी गांव में जाने पर मिलेगा। आज से 20 साल पहले गांव में बाइक नहीं हुआ करते थे। जब कभी कोई दुपहिया वाहन खरीदता था, तो दूर-दूर तक इसकी चर्चा होती थी। आज गांव गांव में भी दुपहिया वाहन धड़ल्ले से दौड़ते हैं। चार पहिया भी कई लोगों के पास में है। ये स्थिति इस बात को सिद्ध करता है कि सरकार के सतत प्रयास से फाइनेंसियल इंक्लूजन का फायदा गांव में भी दिख रहा है।

लेकिन मेरे बिचार से अभी भी फाइनेंसियल इंक्लूजन का लक्ष्य पूर्ण रूप से पूरा नहीं हुआ है। ये हमारे देश के सर्वांगीण विकास लिये बहुत ही महत्वपूर्ण है।

 

निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए वित्तीय समावेशन की जरूरत है।



  1. गरीबी और बेरोजगारी के निराकरण के लिये पूँजी की अवश्यकता होती है। जो लोग अभी तक वित्तीय सुविधा से वंचित है हैं उनको वित्तीय समावेशन से पूंजी के लिए बैंक जाकर ऋण लेने का अवसर मिल सकता है। बैंक से ज्यादा से ज्यादा जुड़ने के लिए इस तरह के कार्य में तेजी लाने की जरूरत है। छोटे-छोटे काश्तकारों एवं कारीगरों को ऋण देकर अपना कारोबार खड़ा करने के लिए वित्तीय समावेशन जरूरी है।
  2. गरीबी का एक बड़ा कारण रोजगार के अवसर की कमी है। रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए स्वयं सहायता समूह, जो वित्तीय समावेशन का एक घटक है को, एक अच्छे विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। इसमें यदि ईमानदारी से मिलजुल कर ऐसा रोजगार चलाया जाए जिस रोज़गार के लिए उस क्षेत्र में संभावना हो, तो इससे रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। 
  3. स्वयं सहायता समूह में समूह एवं बैंक का लिंकेज के कारण रोजगार के अवसर बढ़े हैं। जो वित्तीय समावेशन के कारण हुआ है। स्वयं सहायता समूह बनाने तथा बैंक लिंकेज करने और वित्त प्रदान करने के लिए तेजी लाने की जरूरत है। इससे वित्तीय समावेशन में भी बढ़ोतरी होगी।
  4. वित्तीय समावेशन के कारण गरीब लोगों में भी जागरूकता बढ़ी है। जिस कारण छोटी-मोटी जरूरतों के लिए वह लोकल मनी लेंडर के पास जाते थे, अब वहां नहीं जा कर ज्यादातर वित्तीय जरूरतें बैंक से पूरा कर लेते हैं। इस कार्य को और सुदृढ़ करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है।
  5. वित्तीय समावेशन के एक  कारक के रूप में किसान क्रेडिट कार्ड को भी लिया जा सकता है। किसान क्रेडिट कार्ड लेने के कारण छोटे-छोटे काश्तकार अब बैंक से समय पर ऋण लेकर खेती करते हैं। जिससे उनका फायदा हुआ है इस पर ब्याज भी कम देना पड़ता है क्योंकि कै बार राज्य सरकारें भी व्याज में सब्सिडी देती है। अभी भी बहुत सारे किसानों को क्रेडिट कार्ड और तरलता की सुविधा प्राप्त नहीं है। इसलिए इस कार्य में तेजी लाने की जरूरत है।
  6. आजकल सरकारी योजनाओं में जो कल्याणकारी योजनाएं हैं, उसमें लाभार्थी को भुगतान उनके खातों में सीधे सरकार के यहां से भेज दिया जाता है। पहले यही काम प्रशासन के यहां भेज कर उसे बांटने के लिए दिया जाता था। जिसमें कई दिक्कतें और घपले बाजी की शिकायतें आया करती थी। डीबीटी यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए लाभार्थी को उनके खाते में सीधे पैसे भेज दिए जाते हैं। इसका बहुत ही सकारात्मक फायदा हुआ है। यह वित्तीय समावेशन के कारण ही संभव हो पाया है। अभी भी बहुत लोगों का खाता नहीं होने के कारण डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का फायदा उन्हें नहीं मिल रहा है। इसलिए इस कार्य को और तेजी से करने की जरूरत है।
  7. आजकल बैंक रहित क्षेत्र में भी कारोबार प्रतिनिधि के माध्यम से छोटे-छोटे खाते खोले जा रहे हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटे-मोटे रकम की जरूरत उनके द्वारा उनके गांव में ही दे दी जाती है। यह भी वित्तीय समावेशन का ही एक उदाहरण है। अभी भी कारोबार प्रतिनिधि की सेवाएं यथेष्ट नहीं हुई है। जरूरत इस बात की है की जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा बीसी बीएफ मॉडल को अमल में लाया जाए और वित्तीय समावेशन के बचे खुचे कार्य जल्द ही पूरे हो जाए।
  8. इस वित्तीय समावेशन के कारण बाहर से पैसा भेजना भी आसान हुआ है। जिस परिवार के सदस्य  बाहर किसी अन्य शहरों में मज़दूरी करते हैं, और जब कभी भी वे पैसे भेजते हैं, तो अब आसानी से उन्हें प्राप्त हो जाता है। परंतु अभी भी यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है। इसलिए वित्तीय समावेशन की जरूरत है।
  9. प्रधानमंत्री जन धन योजना में खोले गए खाते भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। इस कारण एक बड़ा तबका जिसके पास कोई बैंक का खाता नहीं था, उसे इसका लाभ सीधे नहीं मिल पा रहा था। उसके पास अब बैंकों में खाता होने के कारण विकास की कई पर योजनाओं का लाभ डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से सीधे उस खाते हैं मिल रहा है। इस तरह के और खाते और खोलने की जरूरत है ताकि समाज में कोई भी ऐसा व्यक्ति ना हो जो बैंक से जुड़ा नहीं हो।
  10. बैंक अब केवल बैंक के प्रोडक्ट ही नहीं बेचती है बल्कि जेनरल इंश्योरेंस यानि साधरण बीमा और शेयर मार्केट का भी बिजनेस करती है। यह भी  फाइनेंसियल इंक्लूजन का एक लक्ष्य था कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति का साधारण बीमा एवं शेयर बाज़ार के कारोबार के लिये बैंक की सहायता ले सकते हैं।इसके लिये वित्तीय साक्षरता का होना जरूरी है। वैसे तो अभी इस क्षेत्र में ज्यादा कार्य नहीं हुआ है लेकिन फाइनेंसियल इंक्लूजन के माध्यम से बीमा का कारोबार भी विस्तृत हुआ है।

 

वित्तीय समावेशन के दृष्टिकोण से वर्तमान बैंकिंग परिदृश्य

 

आज की तारीख में यदि वित्तीय समावेशन के दृष्टिकोण से वर्तमान बैंकिंग परिदृश्य को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि अभी इसका शत प्रतिशत लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है। 

भारतवर्ष एक बहुत विशाल देश है और यहां की ज्यादातर आबादी गांव में रहती है। वित्तीय संस्थान मुख्य रूप से शहरी और अन्य शहरी क्षेत्रों में ही सीमित है। इसको पूरा करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में शाखाओं का होना बहुत जरूरी है। ग्रमीण क्षेत्र में बैंक की शाखाओं के विस्तार में निम्नलिखित दिक्कतें आती हैं।



  1. बैंक बैंकों का ऑपरेटिंग कॉस्ट यानी समव्यवहार लागत बहुत ज्यादा होता है। बैंक सेवा प्रदाता के रूप में अपना व्यापार करता है। बैंक ग्राहकों का खाता खोलकर उन से निधियों को जुटाता है और उसका उपयोग ऋण देने में करता है। जमा निधियों पर ब्याज की दर कम है। और ऋण  पर उससे थोड़ी ज्यादा। इस बीच के मार्जिन के आधार पर उन्हें अपना सारा खर्चा वेतन आदि का खर्च वहन करना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्र में यदि शाखा खोली जाए तो वहां गरीबी के कारण जमा राशि की निधि उस तरह से नहीं बढती है  जिस तरह से शहरी और अर्ध शहरी क्षेत्रों में होता है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्र में बैंकों के लिए ब्रिक एंड मोर्टार वाली शाखा मतलब बैंक के तरह का सेटअप  बैंक के दृष्टिकोण से फायदेमंद नहीं रहता है।
  2. बैंक में ऐसी स्थितियां बहुत कम आती है जब उसी क्षेत्र का व्यक्ति जिस क्षेत्र में बैंक है, वहां पदस्थापित हो उसकी बोल चाल की भाषा ग्रामीण परिवेश से मेल नहीं खाती है। इसलिए बैंक के स्टाफ पूरी तौर पर वहां के क्षेत्र के लोगों से घुल मिल नहीं पाते हैं, जिसका सीधा असर उनके कार्य स्तर पर पड़ता है। और जो वित्तीय समावेशन के लक्ष्य है वह त्वरित गति से पूरा नहीं हो सकता है।



3.            इधर कुछ सालों से अनेक कारणों से बैंकों में एनपीए की समस्या बढ़ी है एनपीए बढ़ने के कारण बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी यानी लाभप्रदता पर बुरा असर पड़ा है। लोगों के मन में यह भावना घर कर गई है कि ऋण नहीं चुकाने पर उन्हें कुछ नहीं होगा और सरकार इसे माफ कर देगी।



4.            बैंक और सहकारी बैंक के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि पूरे देश में करीब 100000 सरकारी समितियां हैं, जिसमें दो तिहाई समितियां निष्क्रिय हैं।



5.            सहकारी समितियां बड़े ऋण वितरण करने में कुशल नहीं होती हैं। और वित्तीय रूप से सक्षम भी नहीं हैं।

6.            बैंक की शाखाओं की कमी बहुत हद तक बीसी बीएफ मॉडल ने कम कर दी है परंतु वांछित लक्ष्य लक्ष्य अभी भी दूर है।



7.            ग्रामीण क्षेत्र में भी एटीएम का लगना भी नगदी निकासी की दिक्कतों को बहुत हद तक दूर कर रहा है



8.            वित्त प्रदान करने वाली अन्य संस्थाएं जो छोटे-छोटे ऋण प्रदान करती हैं उनका भी क्षेत्र बढ़ा है। पर अभी और बढ़ाने की गुंजाइश है।



9.            क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने भी ग्रामीण क्षेत्र में बहुत सारी शाखाएं खोली हैं और यह वित्तीय समावेशन के भी क्षेत्र में बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं।

 

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कह सकते हैं वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में बहुत हद तक प्रगति हुई है। परंतु यह प्रगति अभी भी नाकाफी है। इसके लिए नाबार्ड भारतीय रिजर्व बैंक और राज्य सरकारों को भी सोचना पड़ेगा। जहां कहीं भी इस की कमी है, वहां उपरोक्त माध्यम से बैंकिंग की सेवाएं प्रदान करनी पड़ेगी, जिससे सम्यक रूप से सबका समेकित विकास हो सके।



भारतीय रिजर्व बैंक के पहल

 

भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय समावेशन के संदर्भ में समय-समय पर दिशा निर्देश जारी किए हैं। उनके अनुसार बैंक के द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं।

  1. बहुत ही कम या शून्य राशि से खाता खोलने के लिए बैंकों को निर्देशित करना तथा मूलभूत बचत खाता या बेसिक बचत खाता खोलने के लिए आदेश जारी करना।
  2. केवाईसी के नियमों का सरलीकरण करना।
  3. बीसी बीएफ मॉडल को सभी बैंकों के द्वारा लागू करवाना।
  4. सूक्ष्म वित्त संस्थाओं को प्रोत्साहित करना।
  5. सेवा क्षेत्र अवधारणा को शत प्रतिशत लागू करना।
  6. बिना समपार्श्विक प्रतिभूति के किसान कार्ड बनाने हेतु बैंकों को निर्देशित करना।
  7. बैंक की नई शाखा खोलने के लिए लाईसेंसिंग नीति में रियायत देना।
  8.  स्वयं सहायता समूह को बैंक से लिंकेज करने हेतु दिशा निर्देश देना।
  9.  बैंक द्वारा जीवन बीमा एवं स्वास्थ्य बीमा बीमा का कारोबार करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा ग्रामीण क्षेत्र में भी इसका प्रचार प्रसार करना

इस प्रकार भारतीय रिजर्व बैंक ने क्षेत्र में काफी सराहनीय कार्य किया है।

 

कारोबार सुलभकर्ता (बीएफ) और कारोबार प्रतिनिधि मॉडल (बीसी मॉडल)

 

मौजूदा समय में बैंक की शाखाएं कोर बैंकिंग प्रणाली से जुड़ी है । इस प्रणाली की विशेषता है कि कोई भी ग्राहक उस बैंक का ग्राहक होता है जिस बैंक की शाखा मैं उसनें खाता खुलवाया है। मतलब यह हुआ यदि किसी ने भारतीय स्टेट बैंक में खाता खुलवाया है तो भारतीय स्टेट बैंक की किसी शाखा से अपना कारोबार कर सकता है। इस प्रणाली में काफी खर्च आता है। अतः इस तरह की शाखा छोटी-छोटी जगहों में लाभप्रद नहीं हो सकती और बैंक घाटे में चलकर ऐसी शाखाओं को नहीं चला सकती है। 

दूसरी तरफ ब्रांच बैंकिंग (यानी शाखा में बैंकिंग का काम) और इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग (यानी आईटी पर आधारित बैंकिंग का प्रसार), बैंक की शाखा खोले बिना, बैंकिंग सेवा से रहित क्षेत्र व उसमें रहने वाले वंचित व्यक्तियों तक बैंकिंग सेवाओं की डिलीवरी यानी बैंकिंग सेवाओं की पहुंच एक मुश्किल कार्य है। 

 

वित्तीय समावेशन का उद्देश्य सर्वप्रथम वित्तीय शिक्षा एवं वित्तीय परामर्श देकर बैंक से जोड़ना है, जो  बिना किसी ठोस माध्यम के, बिना बैंक शाखा खोले, कम  खर्च पर यानि वहन करने योग्य खर्च पर एक कठिन कार्य है।

इसी मुश्किल को हल करने के लिए कारोबार सुलभकर्ता (बीएफ) और कारोबार प्रतिनिधि मॉडल (बीसी मॉडल) जिसे असान भाषा में बीसी एवं बीएफ मॉडल कहते हैं का प्रादुर्भाव हुआ है।

 

इसे सरल भाषा में निम्न रुप से समझा जा सकता है।

 

01) बैंकिंग का वर्तमान इंफ्रास्ट्रक्चर एवं बैंकिंग सेवाओं की डिलीवरी की मांग दोनों में बहुत अंतर है। 

 

02) यह अंतर भारत सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों के अनुसार ग्रामीण परिवेश के सर्वांगीण विकास के लिए वित्तीय समावेशन कार्यक्रम के चलते बहुत बढ़ गई है। 

 

03) बैंकिंग सेवाओं की डिलीवरी की वर्तमान उपलब्धता एवं इन सेवाओं की वर्तमान मांग मैं बहुत अंतर है। 

 

04) चुकि बैंकिंग सेवा के मांग को पूरा करने के लिए बैंक रहित क्षेत्र में ज्यादा  खर्च के चलते, ज्यादा से ज्यादा शाखाओं का खोलना संभव नहीं था। अतः इस अंतराल को पाटने के लिए वाहन करने योग्य खर्चे पर बी सी एवं बीएफ मॉडल को अपनाया गया।

 

कारोबार सुलभकर्ता (बीएफ) और कारोबार प्रतिनिधि मॉडल (बीसी मॉडल)

की भूमिका

 

01) बैंक के एक्सटेंन्डेड आर्म यानि विस्तारित हाथ के रूप में काम करना।

 

जो काम बैंक वाले करते हैं वही काम ग्रामीण क्षेत्र में बैंक के प्रतिनिधि के रूप में यह मॉडल करेगा। उदाहरण के तौर पर बैंक का मुख्य कार्य जमा करना एवं उसे प्राप्त निधि को ऋण के रूप में देना है। इस क्रम में बीच में कई अन्य कार्य होते हैं जैसे बैंक में नया खाता खोलना उसने खाते में पैसे का जमा करना जरूरत पड़ने पर उसकी निकासी। जरुरत से ज्यदा पड़े अतिरिक्त धन को भविष्य हेतु मियादी जमा के रूप में  रखना। प्रतिमाह बचत के लिए रिकरिंग डिपॉजिट खोलना। ऋण लेने के लिए जानकारी प्राप्त करना। ऋण लेने के लिए आवेदन पत्र भरना। पासबुक अपडेट करना। खाते में कितने पैसे बचे हैं आदि की जानकारी देना शामिल है। बैंक वाले इन कार्य के लिए जो समय खर्च करते हैं, यह सारे कार्य इस मॉडल के द्वारा हो सकता है।

 

02) मित्र दार्शनिक और मार्गदर्शक की भूमिका

सही मायने में देखा जाए तो ग्रामीण क्षेत्र के लोग बैंक में जाने से कतराते हैं उन्हें ऐसा लगता है कि बैंक में जाने से उनकी बातें नहीं सुनी जाएगी। उसी क्षेत्र का यदि कोई बीसी या बीएफ है तो उससे बात करने में उसे हिचक नहीं होगी।। 

 

03) वित्तीय साक्षरता एवं ऋण परामर्शदाता की भूमिका

यदि बीसी एवं बीएफ को उचित ट्रेनिंग दे दी जाए एवं बैंकिंग की पूर्ण जानकारी उसे दे दी जाए तो वह ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए मित्र दार्शनिक और उनके वित्तीय जरूरतों के लिए मार्गदर्शक के अलावे वित्तीय साक्षरता एवं ऋण परामर्शदाता के रुप में भूमिका अदा कर सकते हैं।

कारोबार सुलभकर्ता (बीएफ) और कारोबार प्रतिनिधि मॉडल (बीसी मॉडल)

के संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा निर्देश

भारतीय रिजर्व बैंक ने उपरोक्त संदर्भ में निम्नलिखित दिशा निर्देश दिए हैं। बैंक निम्नलिखित की सेवायें ले सकते हैं जो बीसी बीएफ मॉडल पर आधारित होगा।

A.             एनजीओ की सेवाएं 

B.           सेल्फ हेल्प ग्रुप की सेवाएं 

C.           माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस की सेवाएं 

D.           सिविल सोसायटी ऑर्गेनाइजेशंस की सेवाएं।

इसके लिए उन्होंने डीसी मॉडल और बीएफ मॉडल को अलग-अलग तरह से उद्धृत किया है।

 

बीएफ मॉडल

 

इस मॉडल के अंतर्गत बैंक उन इंटरमीडियरीज को उपयोग कर सकते हैं जो 

  1. एनजीओ 
  2. फार्मर क्लब 
  3. कोऑपरेटिव कम्युनिटी पर आधारित ऑर्गेनाइजेशंस हैं। 
  4. ये आईटी से संबंधित रूरल क्षेत्र में किसी भी बड़ी कंपनी पर कोई आउटलेट हो या 
  5. पोस्ट ऑफिस, 
  6. इंश्योरेंस एजेंट, 
  7. ग्रामीण जानकारी सेंटर, 
  8. एग्री क्लिनिक 
  9. एग्री बिजनेस सेंटर 
  10. कृषि विज्ञान केंद्र 
  11. केवीआइसी 
  12. केवीआइबी यूनिट  

तो बैंक उसका उपयोग एक इंटरमीडियरी के रूप में बिजनेस फैसिलिटेटर मॉडल के अंतर्गत कर सकता है। यह निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं।

  1. ऋण लेने वाले व्यक्तियों की पहचान करना।
  2.  ऋण लेने वाले व्यक्ति के संबंध में जानकारी जुटाना एवं उसे सत्यापित करना। दूसरे शब्दों में प्राथमिक तौर पर ऋण आवेदन पत्र की प्रोसेसिंग करना।
  3.  उनके द्वारा जिस कार्य के लिए ऋण लिया जा रहा है उसका वायविलीटी रिपोर्ट एवं टेक्निकल फीजिबिलीटी रिपोर्ट बनाना। 
  4. इस आवेदन पत्र को बैंक में जमा करना।
  5. उन्हें बचत के बारे में जागरूक करना बचत के प्रोडक्ट की जानकारी देना एवं ऋण के बारे में परामर्श देना।
  6. स्वयं सहायता समूह का एवं संयुक्त देता समूह का गठन करना एवं उसकी देखरेख करना।
  7. समूह एवं व्यक्तिगत लोगों को ऋण देने के पश्चात उसकी देखरेख करना।
  8. स्वयं सहायता समूह को उसकी आवश्यकता के अनुसार, वित्तीय जानकारी प्रदान करना एवं हैंड होल्डिंग यानी जिस प्रकार बच्चे को बाहों में ले लिया जाता है, उस तरह से एस एच जी यानी स्वयं सहायता समूह एवं जेएलजी यानी संयुक्त देयता समूह का लालन पालन करना।
  9. ऋण वितरण के पश्चात उसके चुकौती की सूची के अनुसार लिए गए ऋण के किस्त जमा करवाना।
  10. इन सब लोगों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से पूर्व स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं है।
  11. उपरोक्त के अलावे बैंक द्वारा जारी बीमा संबंधी थर्ड पार्टी प्रोडक्ट, मुचवल फंड, माइक्रो इंश्योरेंस, पेंशन प्रोडक्ट एवं अन्य प्रोडक्ट को प्रचारित करना एवं उसे सेल करना।
  12. रेमिटेंस संबंधी जानकारी मुहैया कराना एवं उसमें सहायता करना।

 

बिजनेस करस्पोन्डेंट मॉडल

 

इस मॉडल में निम्नलिखित व्यक्ति या इकाई को बैंक बिजनेस कॉरस्पॉडेंट बना सकती है।

  1. सोसायटी एक्ट एवं ट्रस्ट एक्ट के अंतर्गत बनाए गए एनजीओ।
  2. सोसायटी एक्ट एवं ट्रस्ट एक्ट के अंतर्गत बनाए गए माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशन।
  3. मूचूअली ऐडेड कोऑपरेटिव सोसायटी एक्ट एवं स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी एक्ट के अंतर्गत बनाए गए कोऑपरेटिव सोसायटी।
  4. कंपनी एक्ट की धारा 25 के अनुसार बनाई गई कोई इकाई।
  5. ऐसी पंजीकृत नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी, जो जनता से डिपॉजिट जमा नहीं कराती है। केवल ऋण का कार्य करती है।
  6. ग्रामीण पोस्ट ऑफिस

 

इन इकाइयों को बिजनेस करेसपोंडेंट बनाने के लिए बैंक को निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए।

  1. बैंक को इन इकाइयों को चिन्हित करने के लिए ड्यू डिलिजेंस का उपयोग करना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि जितनी सतर्कता हो सकती है, उससे बरतना चाहिए। उन्हें जिन बिंदुओं पर सतर्कता बरतनी है वह भारतीय रिजर्व बैंक के वेबसाइट पर उपलब्ध है।
  2. बिजनेस करेसस्पोंडेंट बनाने के लिए बैंक को पूरा प्रचार करना चाहिए, ताकि सबको यह मालूम हो जाए।
  3. बैंक को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जिस इकाई को वह बिजनेस कॉरस्पॉडेंट बना रहे हैं, उनकी उस क्षेत्र में रेपुटेशन अच्छी होनी चाहिए और सभी लोगों को उन पर भरोसा होना चाहिए ताकि इस पर कोई दूसरे तरह का अर्थ ना निकले।
  4. फैसिलिटेटर के कार्य बैंक के नियमों के अनुसार बैंकिंग सर्विसेज के आधार पर ही आधारित होगी। लेकिन जमा एवं ऋण संबंधी इस कार्य के लिए बैंक की शाखा के बाहर भी यह कार्य हो सकते हैं।
  5. उपरोक्त वर्णित कार्य के लिए इस बात का बिल्कुल ध्यान देना चाहिए कि यह सारे कार्य बैंक के दिशा निर्देशों के आधार पर और बैंक द्वारा तय किए गए मानकों के पूरे पूरे अनुपालन के आधार पर होगा।

बिजनेस फैसिलिटेटर एवं बिजनेस कॉरस्पॉडेंट के लिए कमीशन का भुगतान 

 

बिजनेस फैसिलिटेटर एवं बिजनेस कॉरस्पॉडेंट को इस बात के लिए पूरी तरह से मना कर दिया गया है कि वह कस्टमर से किसी भी तरह की कोई सेवा शुल्क या  चार्जेज आदि नहीं वसूल करेंगे। 

उनके लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने अलग से परिपत्र जारी कर उनको को दिए जाने वाले कमिशन के बारे में जानकारी दी है। जो जरूरत के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा घटाई बढ़ाई जा सकती है। उनका भुगतान उसी के अनुसार होना चाहिए।

 

बिजनेस फैसिलिटेटर एवं बिजनेस कॉरस्पॉडेंट के लिए अन्य निर्देश

  1. बैंक बिजनेस फैसिलिटेटर एवं बिजनेस कॉरस्पॉडेंट के सेवाओं के लिए वित्तीय सीमा स्वयं तय करेंगे।
  2. उनके द्वारा किए गए वित्तीय लेनदेन दूसरे दिन सम्बन्धित बैंक में दिखाई पड़ना चाहिए। इसलिए इसका अपडेशन साथ-साथ होना चाहिए
  3. उनके साथ किए गए करार पत्र में साफ-साफ लिखा होना चाहिए कि यदि इनकी गलती होती है, तो बैंक जिम्मेदार होगा।
  4. बैंक को इनके द्वारा किए गए किसी शिकायत को सेट्टल करने के लिए एक सिस्टम बनाना पड़ेगा, जिसमें उसके ग्रीवांसेज को सेटल किया जा सके। इसके लिए एक क्षेत्रीय कार्यालय के स्तर पर एक अधिकारी जिम्मेदार होंगे, जो ग्राहकों के बिजनेस फैसिलिटेटर या बिजनेस कर फ़ॉन्डेंट के साथ किए गए लेन देन की शिकायतों का निपटारा कर सके।
  5. इसके लिए एक निश्चित समय सीमा तय होनी चाहिए  जो भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों के अंदर हो।
  6. वेब साइट पर  इसे इस तरह से दर्शाया जाना चाहिए कि यदि कस्टमर संतुष्ट नहीं है तो बैंक कर्ज ओंबुद्समैन के पास जा सकता है।
  7. केवाईसी संबंधी जांच बैंक के नियमानुसार होगी। बैंक यदि चाहे तो उसमें कुछ छूट दे सकती है। परंतु यह बैंक के नियमानुसार ही होगा।

 

वित्तीय समावेशन में प्रौद्योगिकी की भूमिका

 

हम लोग पढ़ चुके हैं कि वित्तीय समावेशन क्या है। अब हमें ये समझना है कि प्रोद्योगिकी का क्या मतलब है।

यहां पर प्रौद्योगिकी का अभिप्राय सूचना प्रौद्योगिकी से है। सूचना प्रौद्योगिकी एक वृहद अर्थ वाला शब्द है। आज के बदलते परिवेश में किसी भी क्षेत्र में  काम करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी की जरूरत होती है। चाहे वह बैंकिंग सेक्टर क्यों नहीं हो। 

 

बैंकिंग प्रोद्योगिकी

 

पहले जब लोग खाता खुलवाने के लिए बैंक में जाते थे, तो बड़े-बड़े लेजर के पन्नों में उनका खाता खुलता था। आज वही खाते कंप्यूटर मैं खुलते हैं। पहले किसी खाते की सारी जानकारी पहले

एक शाखा तक ही सीमित रहती थी। 

 

पर अब बैंकिंग प्रोद्योगिकी के चलते खाते खोलने का काम कोर बैंकिंग सोल्यूशन के प्लेटफॉर्म पर है। इस कारण ये डाटा किसी भी शाखा या उनके किसी भी प्रशाशनिक कार्यालय से देखा जा सकता है। ग्राहक किसी भी शाखा मे जाकर लेन देन कर सकते हैं। इसमें अन्य कई विशेषताएं हैं, जिस कारण  एनी टाईम बैंकिंग एवं एनी वेयर बैंकिंग सफल हो सका है।

यह कार्य सूचना प्रौद्योगिकी के बैंकिंग से संबंधित प्रौद्योगिकी द्वारा हो सकता है। बैंकिंग प्रौद्योगिकी के अंतर्गत कोर बैंकिंग सॉल्यूशन अपनाने से कई नई नई सुविधाएं आ गई हैं यह निम्न वत है।

  1. एनीव्हेयर बैंकिंग
  2. ई केवाईसी
  3. इंटरनेट बैंकिंग एवं एनीटाइम बैंकिंग
  4. आइएमपीएस 
  5. ए ई पी ए एस 
  6. मोबाइल बैंकिंग 
  7. एनईएफटी 
  8. आरटीजीएस 
  9. डीबीटी 
  10. चेक ट्रंकेशन
  11. इलेक्ट्रॉनिक समाशोधन आदि आदि

 

सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के कई स्टेक धारक हैं इसमें मुख्य रूप से दूरसंचार विभाग, इंटरनेट, बैंक तथा ग्राहक हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के कारण यह संभव हुआ है कि कम खर्चे पर इस तरह के कार्य कम समय में एवं बिना त्रुटि के किए जा सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के मार्गदर्शन के आधार पर कई संगठन जैसे भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) बैंकिंग प्रौद्योगिकी के विकास एवं अनुसंधान संस्थान (आईडीआरबीटी) आदि नई नई योजनाएं बना रहे हैं, जो बैंक के अनुरूप है। इन सब की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इनके जितने खर्चे हैं, वे वहन करने योग्य हैं।

 

सूचना प्रौद्योगिकी का समावेशन में भूमिका

सूचना प्रौद्योगिकी के बैंकिंग प्रौद्योगिकी का उपयोग उपयोग कर वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में ऐतिहासिक काम तब हुआ जब इस तरह के हस्त चालित डिवाइस जैसे मोबाइल कार्ड, माइक्रो एटीएम और किओस्क का उपयोग करना शुरू हुआ एवं ऐसे फ्रंट एंड डिवाइस के द्वारा किए गए लेनदेन को जब बैंकिंग के लेन देन के प्लेटफार्म सीबीएस के साथ एकीकृत किया गया। 

 

इसका मतलब यह हुआ कि जब कभी कोई बैंक द्वारा अधिकृत व्यक्ति बैंक के ग्राहक के लिये ऐसे डिवाइस का उपयोग करता है, तो सबसे पहले वह बैंक के सीबीएस प्लेटफार्म से जुड़ता है। दोनों का जुड़ाव इंटरनेट के आधार पर होता है। बीच में कोई टेलीफोन तार से जुड़ा हुआ नहीं होता है। इस डिवाइस में किया गया लेन देन सीधे बैंक के सीबीएस प्लेटफॉर्म से ऑनलाइन जुड़ा हुआ होता है। ऐसा करने से पूर्वनिर्धारित सीमा तक ऑनलाइन लेन देन बैंक से दूर रहते हुए भी बैंक से किया जा सकता है। इसके आधार पर सुदूर क्षेत्र में बैठा हुआ सीएसई बैंक से सीधे जुड़ कर कस्टमर के खाते के बैलेंस चेक कर सकता है। उसमें पैसे जमा कर सकता है और पैसे की निकासी भी कर सकता है।

 

ऐसी प्रौद्योगिकी आ जाने के कारण सुदूर क्षेत्र में बैंक के ग्राहकों का बैंक से जुड़ना आसान हो गया।

 

ई केवाईसी के कारण बैंक में खाता खोलना भी आसान हो गया है। इस कारण वित्तीय समावेशन का काम भी आसान हो गया है।

ग्राहक यदि एंड्रॉइड मोबाइल का उपयोग करता है और थोड़ी बहुत जानकारी हो तो मोबाइल बैंकिंग और अन्य सम्बन्धित कार्य भी कर सकता है।